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शीर्षक- सुनिश्चित है  जो अहम के वशीभूत हो ठूठ बने रह गए,

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शीर्षक- सुनिश्चित है

जो अहम के वशीभूत हो ठूठ बने रह गए,

उनका एक न दिन तो पतन सुनिश्चित है,

जो ढलना भूल कर उम्र भर अकड़े रह गए,

उनका एक न दिन तो गिरना सुनिश्चित है ।

 

जो सुपरिवर्तन को सहज स्वीकार न सके,

उनकी एक न दिन तो अवनति सुनिश्चित है,

जो कमियों में सुधार का शिल्प न गढ़ सके,

उनकी एक न दिन तो गिरावट सुनिश्चित है ।

 

जो आचरण को सुव्यवस्थित न कर सके,

उनकी एक न दिन तो पराजय सुनिश्चित है,

जो समय की कीमत समय रहते न समझ सकें,

उनकी एक न दिन तो दुर्गति सुनिश्चित है ।

 

जो विनम्रता को व्यहवार में न उतार सके,

उनका एक न दिन तो ह्रास सुनिश्चित है,

जो ऊॅंच-नीच की दीवार को न गिरा सके,

उनका एक न दिन तो विषाद सुनिश्चित है।

 

जो कड़वाहट को मन से सहज न निकाल सके,

उनकी एक न दिन तो अस्वस्थता सुनिश्चित है,

जो सत्यता के “आनंद” को न अपना सके,

उनकी एक न दिन तो शिकस्त सुनिश्चित है ।

– मोनिका डागा “आनंद”

आपके स्नेह और प्यार का धन्यवाद

रचना स्वरचित और सर्वाधिकार सुरक्षित

 

 

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