Home दुनिया संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधारों का विरोध करने वाले देशों पर बरसे...

संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधारों का विरोध करने वाले देशों पर बरसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर, कहा— ‘अब अप्रासंगिक हो चुकी है मौजूदा व्यवस्था’

0
संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधारों का विरोध करने वाले देशों पर बरसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर, कहा— 'अब अप्रासंगिक हो चुकी है मौजूदा व्यवस्था'
नई दिल्ली:भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक मंच पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के गिरते प्रभाव और इसमें सुधार न होने की जिद पर अड़े देशों को एक बार फिर कड़ा संदेश दिया है। कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में एक संवाद सत्र के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि साढ़े चार साल से अधिक समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष, खाड़ी देशों के भीषण टकराव (इजरायल-हमास-इरान संकट) और कोविड-19 महामारी के समय वैश्विक फैसले लेने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका काफी हद तक अप्रासंगिक और प्रभावहीन रही है। 
जयशंकर ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र वर्तमान में एक बड़े गतिरोध (Gridlock) में फंसा हुआ है और यह पूरी दुनिया के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहा है।” 
क्यों नहीं बदल रही संयुक्त राष्ट्र (UN) की व्यवस्था?
विदेश मंत्री ने उन कारणों और विडंबनाओं पर प्रकाश डाला जिसके चलते UN के ढांचे में बदलाव नहीं हो पा रहा है:

 

  1. चंद देशों का एकाधिकार और रुकावट: जयशंकर ने किसी देश का नाम लिए बिना निशाना साधते हुए कहा कि मुट्ठी भर देश संयुक्त राष्ट्र में सुधारों का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। ये वो देश हैं जो संस्था की मजबूती की परवाह किए बिना केवल अपने निजी हितों के लिए इसका इस्तेमाल (Use) कर रहे हैं। 
  1. Facebook:-https://www.facebook.com/sandhyatoday
  2. 2. अफ्रीका के नाम पर राजनीति: विदेश मंत्री ने एक बड़ी विडंबना का खुलासा करते हुए कहा कि कुछ देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों को ब्लॉक करने के लिए अफ्रीका महाद्वीप के नाम का बहाना बनाते हैं। जबकि असलियत यह है कि अफ्रीकी देश स्वयं अंतर-सरकारी वार्ताओं में शामिल होकर यह साफ कर चुके हैं कि वे किस प्रकार का बदलाव और प्रतिनिधित्व चाहते हैं।
  3. 3. 945 का पुराना मैनेजमेंट अब नहीं चलेगा: डॉ. जयशंकर ने तर्क दिया कि जब संयुक्त राष्ट्र की शुरुआत हुई थी, तब इसके केवल 51 सदस्य देश थे। आज यह संख्या करीब चार गुना (193 सदस्य) बढ़ चुकी है। एक सामान्य समझ की बात है कि यदि संस्था का आकार चार गुना बढ़ जाए, लेकिन उसका मैनेजमेंट ढांचा (UNSC के वीटो पावर्ड स्थायी सदस्य) वही पुराना 80 साल पुराना रखा जाएगा, तो वह व्यवस्था कभी सफल नहीं हो सकती। 

  • वैश्विक गतिरोध: यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों के टकराव (मिडिल ईस्ट संकट) जैसे बड़े मुद्दों को सुलझाने में संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह फेल रहा। 
  • अफ्रीका का बहाना: कुछ देश संयुक्त राष्ट्र में बदलाव को रोकने के लिए अफ्रीका के नाम का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। 
  • दोगुना रवैया: सुधारों का विरोध करने वाले देश UN को मजबूत नहीं करना चाहते, वे सिर्फ इस संस्था का इस्तेमाल करना चाहते हैं। 
  • समाधान की मांग: संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करना या खत्म करना इसका उपाय नहीं है, बल्कि इसके पुराने मैनेजमेंट ढांचे को तुरंत बदलना जरूरी है।
सुधार सर्वसम्मति से नहीं, लोकतांत्रिक तरीके से हो
जयशंकर ने इस विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार केवल ‘सर्वसम्मति’ (Consensus) से ही संभव है। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा, “जैसे किसी भी देश या संसद में बहुमत और वोटिंग के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं, वैसे ही यूएन में भी होना चाहिए। सभी देशों को अपने विचार रखने की आजादी हो और फिर मतदान (Voting) के जरिए सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।” 
‘UN को खत्म करना समाधान नहीं, इसे ठीक करना होगा’
दुनियाभर में संयुक्त राष्ट्र की घटती साख के कारण बढ़ते असंतोष के बीच, भारत ने साफ किया है कि वह यूएन को दरकिनार करने के पक्ष में नहीं है। विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए संयुक्त राष्ट्र ने अतीत में बड़ी सेवाएं दी हैं और आज भी इसकी जरूरत है। हमारा लक्ष्य इस संस्था का विकल्प ढूंढना या इसे नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि “Fix the UN” यानी संयुक्त राष्ट्र को सुधारना होना चाहिए। हालांकि, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र प्रशासन को खुद भी आगे बढ़कर इस सुधार प्रक्रिया को स्वीकार करना होगा।
यह ही खबर पढ़े:-  आदि कैलाश में 14,500 फीट पर लगा जाम,पर्यटकों की बढ़ी परेशानी | Sandhya Today

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version