कार्यस्थल सुरक्षा, कानूनों के पालन और जवाबदेही की कमी को बताया दुर्घटनाओं की मुख्य वजह; श्रमिकों की सुरक्षा के लिए व्यापक सुधारों की जरूरत पर दिया जोर
नई दिल्ली। भारत में फैक्ट्रियों, खदानों, रासायनिक संयंत्रों और निर्माण स्थलों पर होने वाले औद्योगिक हादसे लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। हर साल ऐसे हादसों में बड़ी संख्या में श्रमिक अपनी जान गंवाते हैं या गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। औद्योगिक सुरक्षा और व्यावसायिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. वी. रमणा धारा का मानना है कि इन हादसों को केवल “दुर्घटना” कहकर नहीं टाला जा सकता, बल्कि इनके पीछे व्यवस्था की कई गंभीर खामियां जिम्मेदार हैं। उनका कहना है कि जब तक सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।
डॉ. धारा के अनुसार, भारत में अधिकांश औद्योगिक दुर्घटनाएं तकनीकी खराबी से अधिक मानवीय लापरवाही और कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था का परिणाम होती हैं। कई उद्योगों में सुरक्षा मानकों का पालन केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा प्रशिक्षण नहीं दिया जाता और कई स्थानों पर सुरक्षा उपकरणों का भी अभाव रहता है। ऐसे में छोटी-सी चूक भी बड़े हादसे का रूप ले लेती है।
उन्होंने कहा कि किसी भी उद्योग में सुरक्षा को खर्च नहीं, बल्कि निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन कई कंपनियां उत्पादन बढ़ाने और लागत कम करने की होड़ में सुरक्षा उपायों की अनदेखी कर देती हैं। नियमित सुरक्षा ऑडिट, मशीनों का रखरखाव और जोखिम का आकलन समय पर नहीं होने के कारण दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।
डॉ. धारा ने यह भी कहा कि भारत में श्रम कानून और औद्योगिक सुरक्षा से जुड़े नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे बड़ी चुनौती है। निरीक्षण तंत्र कई जगह कमजोर है और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं हो पाती। उनका मानना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई छोटे और मध्यम उद्योगों में प्रशिक्षित सुरक्षा अधिकारियों की कमी है। कर्मचारियों को आग लगने, रासायनिक रिसाव, गैस लीक या अन्य आपातकालीन स्थितियों से निपटने का नियमित अभ्यास भी नहीं कराया जाता। परिणामस्वरूप, जब कोई दुर्घटना होती है तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।
डॉ. धारा ने कार्यस्थल पर सुरक्षा संस्कृति विकसित करने पर विशेष जोर दिया। उनका कहना है कि सुरक्षा केवल प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक कर्मचारी की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि कर्मचारी किसी खतरे को देखते हैं तो उन्हें बिना किसी डर के उसकी जानकारी देने का अधिकार और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इसके लिए उद्योगों में पारदर्शी और जवाबदेह कार्य संस्कृति विकसित करना आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक हादसों के बाद अक्सर जांच समितियां बनती हैं और रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन उन रिपोर्टों में सुझाए गए सुधारों को पूरी तरह लागू नहीं किया जाता। यही कारण है कि एक जैसी गलतियां बार-बार दोहराई जाती हैं। यदि हर बड़ी दुर्घटना से सीख लेकर सुधारात्मक कदम समय पर उठाए जाएं, तो भविष्य में कई हादसों को रोका जा सकता है।
डॉ. धारा के अनुसार, नई तकनीकों का उपयोग भी औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत कर सकता है। आधुनिक सेंसर, गैस डिटेक्शन सिस्टम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों से संभावित खतरों की पहले ही पहचान की जा सकती है। इससे दुर्घटनाओं की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने सरकार, उद्योग जगत और श्रमिक संगठनों से मिलकर काम करने की अपील की। उनका कहना है कि श्रमिकों की सुरक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। यदि सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराए जाएंगे तो इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, कर्मचारियों का विश्वास मजबूत होगा और उद्योगों की साख भी बेहतर होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे तेजी से औद्योगिक विकास कर रहे देश में कार्यस्थल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है। यदि सुरक्षा मानकों का ईमानदारी से पालन किया जाए, नियमित निरीक्षण हो, कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिले और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, तो औद्योगिक हादसों और कार्यस्थल पर होने वाली मौतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
- डॉ. वी. रमणा धारा ने औद्योगिक हादसों के पीछे व्यवस्था की खामियों को जिम्मेदार बताया।
- सुरक्षा नियमों के कमजोर पालन और निगरानी की कमी को बड़ी वजह बताया।
- कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता पर जोर।
- सुरक्षा को खर्च नहीं, बल्कि निवेश मानने की जरूरत।
- निरीक्षण तंत्र और जवाबदेही मजबूत करने की मांग।
- आधुनिक तकनीक और AI आधारित निगरानी अपनाने की सलाह।
- सरकार, उद्योग और श्रमिक संगठनों के साझा प्रयासों पर बल।
- सुरक्षित कार्यस्थल से उत्पादन और श्रमिकों का विश्वास दोनों बढ़ेंगे।


