ज्ञान और सिखावन का पर्व है शिक्षक दिवस।
गुरु—यह शब्द अपने आप में अत्यंत ऊंचा और व्यापक अर्थ रखता है। गुरु वही है जो हमें किसी भी क्षेत्र में सही दिशा में आगे बढ़ना सिखाता है। विद्यालय में बच्चे को सबसे पहले ए, बी, सी सिखाई जाती है, फिर शब्द और वाक्य बनाना, बोलना और व्यवहार करना सिखाया जाता है। यानी शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में किस प्रकार आगे बढ़ना है और अपनी बात किस तरह व्यक्त करनी है, यह भी शिक्षा का ही हिस्सा है।
हर गुरु का अपना एक क्षेत्र और सिखाने का दायरा होता है। हम अकादमिक या शैक्षिक शिक्षा के माध्यम से बच्चों को यह सिखाते हैं कि उन्हें इस संसार में अपने भौतिक जीवन को किस प्रकार जीना है। जिन शिक्षकों ने हमें शिक्षा दी, समय के साथ हम स्वयं भी शिक्षक की भूमिका में आ जाते हैं। जीवन में किसी को सिखाने का अवसर मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, क्योंकि यह अवसर हर किसी को नहीं मिलता।
लेकिन क्या केवल सांसारिक और अकादमिक शिक्षा ही पर्याप्त है? जीवन के कुछ ऐसे मूलभूत प्रश्न भी हैं, जिनके उत्तर हमें सामान्य शिक्षा व्यवस्था में नहीं मिल पाते।
मैं कौन हूं? मैं कहां से आया हूं? यह जीवन क्या है? मृत्यु के बाद मेरे साथ क्या जाएगा?
ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनकी खोज और समझ अत्यंत आवश्यक है।
जो इन मूलभूत प्रश्नों के उत्तर और सत्य का ज्ञान प्रदान करता है, उसे ‘सत्य गुरु’ कहा गया है। ‘सत्’ का अर्थ सत्य है और जो गुरु हमें इस सत्य का ज्ञान कराता है, वही सत्य गुरु कहलाता है।
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अध्यात्म क्या सिखाता है?
यह शरीर मिट्टी से बना है। जब इसमें चेतना या आत्मा का प्रवेश होता है तो हम उसे जन्म कहते हैं, और जब वही चेतना शरीर से बाहर निकल जाती है तो उसे मृत्यु कहा जाता है। जन्म और मृत्यु के बीच के इस जीवन को अध्यात्म में एक लीला के रूप में देखा गया है।
सत्य का ज्ञान ही अध्यात्म है। अंग्रेजी में इसे ‘spirituality’ कहा जाता है। अध्यात्म केवल शरीर से संबंधित विषय नहीं है, बल्कि आत्मा और ऊर्जा से जुड़ा हुआ है। शरीर बाहरी जीवन और धार्मिक-सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़ा हो सकता है, लेकिन अध्यात्म का संबंध उस आत्मा से है जो अपने मूल घर की ओर लौटने की आकांक्षा रखती है।
इसे पारब्रह्म या सचखंड की ओर जाने की यात्रा के रूप में समझा जाता है।
जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि जीवन की परिस्थितियां और भूमिकाएं भी एक व्यापक यात्रा का हिस्सा हैं, तब उसके भीतर स्वीकार्यता का भाव पैदा होता है। हमें जीवन में अलग-अलग भूमिकाएं निभानी होती हैं—कहीं शिक्षक, कहीं विद्यार्थी, कहीं पत्नी, कहीं मां या पिता। जिस परिस्थिति में हम हैं, उसमें स्वयं को संतुलित रखते हुए स्वीकार करना ही जीवन में सहजता लाता है।
जीवन की स्वीकार्यता और मानसिक संतुलन जरूरी
आज के समय में बच्चों और युवाओं के सामने तनाव और मानसिक दबाव बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार न कर पाना और संतुलन खो देना व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर सकता है।
यदि हम स्वयं को संतुलित रखना सीख जाएं और जीवन को उसकी परिस्थितियों के साथ स्वीकार करना शुरू कर दें, तो जीवन में सहजता और प्रसन्नता बढ़ सकती है।
आज मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में बहुत विकास किया है। हमारे हाथ में सुविधाएं और संसाधन पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन इसके बावजूद भीतर की अशांति बढ़ती दिखाई देती है। यानी बाहर विकास हो रहा है, लेकिन यदि भीतर शांति नहीं है तो यह विकास अधूरा है।
इसीलिए बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की शिक्षा देना भी आवश्यक है।
शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं
एक शिक्षक की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका केवल विषय पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन का मूलभूत ज्ञान देना भी है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि वे कौन हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है, भाग्य क्या है, और परिस्थितियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है।
यदि शिक्षक स्वयं इन प्रश्नों को समझेंगे और जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को जानेंगे, तो यह ज्ञान स्वाभाविक रूप से विद्यार्थियों तक भी पहुंच सकता है।
जब व्यक्ति को जीवन की समझ मिलने लगती है, तो दुख, तनाव और परिस्थितियों से संघर्ष करने की प्रवृत्ति कम हो सकती है। इसी संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध भाव—“जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा ही होगा”—को जीवन में स्वीकार्यता और संतुलन के संदेश के रूप में समझा जा सकता है।
सत्य का ज्ञान जब जीवन का हिस्सा बनता है, तो व्यक्ति के भीतर शांति और संतुलन स्थापित होने की दिशा में मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
शिक्षक दिवस के अवसर पर यह विचार महत्वपूर्ण है कि शिक्षा केवल रोजगार और भौतिक सफलता तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन को समझने, परिस्थितियों को स्वीकार करने, स्वयं को जानने और भीतर शांति स्थापित करने की दिशा भी दिखाए। यही शिक्षा को जीवनोपयोगी और सार्थक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
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